Friday, March 18, 2011

''बाबा'' ने ''धरती'' पर अपने ''पैर से चार बार प्रहार'' किया.



Dt ..18 march।2011..night..10.10.pm.Delhi ..Aashram.
''सावधान ...सावधान....सावधान....''

''एक विशिस्ट घटना की निश्चित
संभावना बन गयी है.''
''मानव शभ्यता के ईतिहास में और ज्ञात स्मृतियों तथा शाश्त्रो में वर्णित ''बाबा''' ..'''आदि पुरुष ''' से सम्बंधित यह घटना इस धरती के जगत के लिए अति महत्वपूर्ण है...''
आज के हो या प्राचीन काल के .मानवों का यह स्वभाव रहा है कि देख कर भी नही मानते हैं.इसी ना मानने के गुण स्वभाव के कारण इन्हे मनुष्य कहा जाता है.यह सारी धरती पर हर जगह मिलते हैं.और अपने स्वभाव से स्वर्ग को भी नरक बना देने का सामर्थ्य रखते हैं......
घटना..!..जिस घटना का मै जिक्र करने जा रहा हूँ.उसका सम्बन्ध सभ्यता के आदि काल से लेकर आज वर्तमान जीवन तक है और जब भी इस धरती पर सभ्यताओ की कहानी मिलती रहेगी और जीवन रहेगा तब तक रहेगा...
युगों की घटना लम्बी है.समय कम... स्थान... छोटा है.
यहाँ पर यह मेरा लेखन एक सुचना और सन्देश मात्र है.यहाँ मानव जाती के बुद्धिजीवियो के लिए.इसमे तर्क के लिए स्थान और समय नही है..क्योकि यह ''यथार्थ'' है..वर्तमान में.आज के जगत /संसार में घटित हो रहा है.....
..जिसे समझना होगा ,समझ जायेंगे.मजाक उड़ाने वाले ,अपने जीवन का मजाक उड़ाने के लिए पूर्ण रूप से स्वतंत्र हैं.....
''''2009 ...के अगस्त में हम जब केदारनाथ--हिमालय में प्रवास कर रहे थे.अपनी बेटी के साथ.तब मेरे पास मेरे शिष्य डाक्टर अश्विन और डाक्टर अल्पा भी आये...साथ में बाम्बे से मन्नू तथा सुमन भी थे...
मैंने ध्यान में ले जाकर अश्विन को कुछ दृश्य व् घटनाक्रम दिखलाया था...
मेरे पिता श्री '''बाबा'' भगवान शिव जी केदार नाथ जी .अत्यंत क्रोध में बैठे हैं.उसी के कुछ दिनों पूर्व मै 14 अगस्त 2009 को श्री बद्रीनाथ जी को वहा के मंदिर से अपने साथ मुक्त करा कर बाहर लेकर 15 अगस्त 2009 को चला आया था .तथा शाम को ऊखी मठ ठहरा था.और १६ अगस्त २००९ को ''मै'' और रूचि केदार नाथ पहुंचे थे.
यह वर्णन 20 अगस्त 2009 और 31अगस्त 2009 के मध्य का यहाँ वर्णित कर रहा हूँ.
डाक्टर आश्विन को आने पर मेरे पास मैंने दिखाया.......

प्रकृति में इस वर्तमान अवस्था के लिए भगवान बिष्णु जी ( बद्रीनाथ जी) ने सभी देवी-देवताओ को दंड दिया और दंड स्वरुप ब्रह्माण्ड का सात चक्कर लगाने का आदेश दिया...
वर्तमान कलयुग में देवी-देवताओ ने सिर्फ अपने अधिकार का भोग किया.
आदि शक्ति ''माँ'' की मुक्ति के बाद भी माँ के पुत्र और माँ को बहुत अपमान सहना पड़ रहा था...
बिष्णु जी ने ब्रह्मा जी के यह कहने पर की .......
''''अभी इस सृष्टि को रहने दिया जाये..आप अपना धर्म निभायिये.आपका धर्म पालन करना है.सृष्टि का आप क्यों बिध्वंस करना चाहते है...?..हम सबने मिल कर इस जगत ,इस सृष्टि को बनाया है,किसी विशेष प्रयोजन से.'''
इस बात पर बिष्णु जी भड़क गये और ब्रह्मा जी को बोला......
'''आप अब एक नये सृष्टी रचना की तैयारी कीजिये...'''
'''बाबा श्री'' बहुत क्रोध में थे क्योकि माँ और अपने पुत्र का बार-बार अपमान देख कर बाबा इस जगत का बिध्वंस कर देना चाहते थे.इसीलिए बार-बार अपने आसन से उठने का प्रयास कर रहे थे.अपने आसन से बाबा उठ जाना चाह रहे थे.फिर बिष्णु जी बाल रूप में बाबा का पैर पकड़ कर बैठ गये.और ''बाबा'' को अभी शांत रहने के लिए प्रार्थना करने के लिए कहने लगे....
''मेरी माँ आदि शक्ति ''कामख्या ''एक तरफ बाबा के चुपचाप खड़ी हो कर सब कुछ देख रही थी .
फिर धीरे से कुछ बोला,ब्रह्मा जी से की ,,,,,
''अभी मै ही कुछ करता हूँ..आप अपने सृष्टी में कुछ फेर बदल कीजिये..''
उसके बाद 31 अगस्त को हम सभी लोग केदार नाथ जी से निचे उतरे और शाम को बाबा नारायण गिरी जी से गुप्त काशी में मिल कर ऊखी मठ पहुंचे .जहाँ पुजारी ने हम सबका स्वागत किया और अपने आवभगत से हमारा सत्कार किया..
01 .SEP .2009 ...को डाक्टर अल्पा का जन्म दिन था.पुजारी के घर हम सबको भोजन कराया गया.साथ में पुजारी के एक मेरी अन्य शिष्या भी थी.हम छः लोग.निचे की और यात्रा पर चल दिए.
मेरे साथ मेरी कार में मेरी बेटी रूचि,डाक्टर अश्विन,डाक्टर अल्पा थे.पीछे बस में मन्नू और सुमन भी थे..हमे छोड़ने पुजारी और मेरी एक अन्य शिष्या आये थे बस स्टैंड तक ,ऊखी मठ में,..

जो प्लेट मेरे सामने पुजारी ने परोसा था.वो रोटी एक अति भयानक जहर मीठी जड़ी से बनी हुयी थी.

और देव प्रयाग...उत्तराखंड में 01 SEP 2009 को ''मै ''''प्रथम मानव शरीरधारी 'अघोर'' पुजारी के घर खिलाये गये रोटी के भयानक जहर के प्रभाव से मै मर गया.
इससे सम्बंधित कुछ-कुछ घटना क्रम बिच-बिच में घटना क्रमानुसार मैंने इस ब्लॉग में लिख दिया है...
कल से कुछ महत्वपूर्ण घटना क्रम हो रहा है...
सम्पूर्ण जगत और सभ्य
आधुनिक समाज को आज मालूम है की जापान में 11 मार्च 2011 को भयानक भूकंप और फिर सुनामी ने बर्बाद कर दिया.फिर ज्वालामुखी और अब रेडिओ एक्टिव तत्वों का विकिरण प्रारंभ हो गया है.....
(1 ) ....एक शिष्य ने ध्यान में कल देखा..
भारत के पश्चिम दिशा के देश की तरफ से काला करेंट पूर्व में ( जापान की ओर ) जा रहा है. धरती से आकाश तक बैज्ञानिक अपना कुछ सिस्टम लगाये हुए हैं.उस पुरे सिस्टम को प्रकृति में ही कुछ विशेष तरह के करेंट उसे चारो तरफ से घेर कर अपने अन्दर ढक ले रहे है.
(2 )....केदार नाथ जी में जो ''बाबा '' का पैर पकड़ कर बाल रूप में श्री बिष्णु जी अभी तक बैठे हुए थे.वो पैर छोड़ कर कल वो उठ गये हैं. और बाबा ने अपने आसन से उठ कर अपने उस पैर से धरती पर चार बार प्रहार किया है.बाबा अपने विकराल रूप में हैं.बाल खुले तथा फैले हुए हैं.जीभ लपलपा रहा है.आँखे लाल -लाल ,बड़ी-बड़ी है तथा प्रचंड क्रोध से भरे हुए हैं...
तथा ब्रह्मा जी को आदेश दिया है की ......
''''फिर से सृष्टि की रचना लिखो..''''
''बाबा'' के पीछे चारो तरफ अपने हाथ जोड़ कर सभी देवी-देवता खड़े हैं...

विशेष---यह एक विकट परिस्थिति है.मै कई वर्सो से धरती की संतुलन को सम्हालने का जी तोड़ प्रयास कर रहा हूँ. हिमालय के उस तरफ धरती के निचे और धरती के ऊपर प्रकृति में कुछ हो रहा है.
पिछले कुछ वर्स से चीन,यूरोप,आस्ट्रेलिया,पाकिस्तान आदि सभी धरती पर चारो तरफ देशो में सभी देख ही रहे हैं.
भारत के पूर्व दिशा में,उत्तर पूर्व दिशा में,तथा उत्तर दिशा तथा पश्चिम में बहुत जल्द ही कुछ भयानक होगा...जिसमे जापान,चीन,रूस,बियातनाम ,मंगोलिया,थाईलैंड,वर्मा ,वियतनाम अमेरिका,यूरोप तथा एशिया और एशिया के मध्य (मुस्लिम आदि देशो में) आदि अनेको देशो में प्राकृतिक विप्लव तथा बिध्वंस घटनाक्रम बहुत तीव्रता से घटित होने की संभावना बनती जा रही है....
प्राकृतिक तत्वों के आपसी टकराव से धरती पर भयानक प्राकृतिक बिध्वंस से ब्यक्ति गत ,प्राकृतिक ,तथा सामूहिक टकराव,राजनितिक स्थिरता और भयानक गृह युद्ध कि स्थितियां बनती जाएँगी और युग अपने अंत की और तेजी से बढ़ता ही जायेगा.
बाबा का अपने आसन से उठ जाना और बिष्णु जी का अब पैर छोड़ देना,बाबा का.... कुछ सन्देश दे रहा है तथा खुलेआम संकेत कर रहा है.यह दृश्य बहुत कुछ कह रहा है.और फिर बाबा श्री का धरती पर अपने पैर से चार बार प्रहार करना बहुत जल्द ही ,निकट कुछ दिनों में बहुत बड़ी प्रलयात्मक घटना का संकेत है.
खुले आम प्रकृति में यह सब हो रहा है...
और सभी बुद्धि जीवी तथा ज्ञानी लोग अंधे की भांति अपनी आँखे खोल कर देख रहे हैं.....
यही तो है परमात्मा का साकार प्रमाण....
मेरे ख्याल से बहुत हो गया.परमात्मा अब सहने के लिए तैयार नही है.. कल युग का अंत काल प्रारंभ हो ही चूका है.
''सावधानी से अपना -अपना ''यथार्थ धर्म''निभायें .''
..सभी स्वतंत्र है.परिस्थितियों में विकटता प्रारंभ हो ही चूका है.अपने अभी तक के ज्ञान की पूरी परीक्षा पिछले किसी लेख में इसी ब्लॉग में दी गयी दो-तीन प्रकार के त्रिकोण -ट्राइंगल के मैप बना कर दिए गये चित्र को देख समझ कर ,कर लेवे....
.भारत का दुनिया का भाग्य उस मैप में रेखांकित कर दिया गया है.
आपको समय-समय पर सुचना और सन्देश दे दिया जायेगा....
सावधान__सावधान__सावधान...

Sunday, March 13, 2011

...''माँ'' ....महा शक्तियों ..के चलने की मधुर ''पगध्वनि'' निरंतर सुनाई देने लगी है''.. ( यह प्रलय की खुले आम आहट है.कान लगा कर सुनो और आँख खोल क

......जैसा की हमने गुजरात जाने के पहले ही अपने फेशबुक में लिख दिया था की, ''मुझे भारत में दिल्ली के पश्चिम दिशा में जाने से धरती के प्रकृति में ,जाग्रत ट्राइंगल से सम्बंधित कुछ देशो में तीव्र परिवर्तन जैसे भूकंप ,अग्नि ,जल बिध्वंस आदि की घटना संभव हो सकती है.क्योकि मेरे आदि शक्तियों के साथ विकृति प्रकृति को मूल प्रकृति में परिवर्तन के लिए गतिमान होने से तत्वों में टकराहट बढ़ने लगती है ,धरती के मैग्नेटिक फिल्ड पर दबाव पड़ता है.हमारे चलने फिरने से जाग्रत त्रिकोण के अवस्था में परिवर्तन होने लगता है...इससे भूकंप,जल प्रलय,वायु प्रलय आने की तुरंत संभावना बनने लगती है...
मै 17 .feb से 26 feb 2011 तक गुजरात के दाहोद शहर में था.इसी बिच न्यूजीलैंड में भूकम्प की घटना घटित हुयी.
02 .मार्च 2011 को ''महा शिवरात्रि '' पड़ने से मुझे तुरंत वापस दिल्ली आना पड़ा.महाशिवरात्रि पर ''बाबा'' का महाभिषेक करना था.और 03 .मार्च 2011 को यहाँ आश्रम पर भंडारा था..
..महाशिवरात्रि और भंडारा का प्रोग्राम बहुत ही धूम धाम से संपन्न हुआ.
इसी बिच अचानक प्राकृतिक दबाव पड़ने से मौसम में अचानक परिवर्तन होने लगा.......बारिस के साथ ठंडक बढ़ने लगा.मौसम मेरे अनुकूल हो गया था.
''बिधाता''....बाबा के आदेशनुसार मुझे अब अपने जाग्रत त्रिकोण के एक कोण पर ,काशी [ बनारस] के लिए जाना था.तुरंत दिल्ली से काशी जाने का आदेश पाने से मै अपने कुछ शिष्यों को ही इस यात्रा के बारे में बतलाया .और अपनी बेटी के साथ मै काशी की ओर
.. निकल पड़ा..
मेरी अपनी उपस्थिति अब माँ तथा सभी शक्तियों के साथ अब अपने जाग्रत त्रिकोण के एक मूल एंगल ,कोण काशी पर स्थित हो चूका था जिससे दिल्ली के कोण पर भार हल्का पड़ने लगा था. भारत के पूर्वी भाग पर दबाव बढ़ने लगा था और ..इसके परिणाम स्वरुप भारत के उत्तर पूर्वी और पूर्वी भाग पर धरती के भीतर दबाव के साथ झटका लगने लगा....
मैंने ब्लॉग में अपने पहले के लेख में भी बार-बार कई अन्य जगहों पर लिखा हुआ है की मेरे साथ महाशक्तियो के चलने फिरने से ,माँ की पग ध्वनि सुनाई पड़ती है....मिसन के गुप्त प्राकृतिक कार्य के जिस उद्येश्य से मै काशी के लिए निकला था ,उस कार्य में रूचि के उर्जा सर्किट पर तीव्र दबाव बढ़ने से उसको तेज ज्वर हो गया.....
मैंने कई दिनों तक धरती के भीतर के गुरुत्वाकर्षण के बैलेंस को चेक करने के बाद अचानक बाबा के आदेश पर काशी क्षेत्र से बाहर निकलने का और काशीक्षेत्र को तुरंत छोड़ने का निर्णय लिया ।और किसी भी तरह
दिल्ली वापसी यात्रा की ब्यवस्था की .....
11 .मार्च .2011 .को मै अपनी बेटी....मूल महाशक्तियों के साथ झारखण्ड संपर्क क्रांति ट्रेन से दिन के 9 बजे मुग़लसराय से अपने वापसी यात्रा दिल्ली के लिए शुरू की.बुखार में रूचि कमजोर लग रही थी .थकी सी.मैंने कुछ दवा देकर उसे सुला दिया था और कुछ समाचार आने का इंतजार करते हुए अपने बर्थ पर लेट कर आराम करने लगा......
तभी दोपहर में मेरे एक शिष्य डाक्टर अश्विन का फोन आया....
'''जापान में 8 .9 तीव्रता का भूकम्प आया था.और लगभग ३० फुट ऊँची सुनामी की लहरे लगातार उठ रही थी तथा जापान को बर्बाद कर रही थी......सचमुच मेरी माँ अर्थात महाशक्तियों के चलने फिरने जो पगध्वनि जगत में उठती है,वो बड़ी ही भयावह होती हैं....
लेकिन परमात्मा भी क्या करे..?.. जगत के प्राकृतिक संतुलन के लिए छोटे मोटे इस तरह की घटनाओ के चक्कर में अपना कार्य तो नही रोक सकता ना.और कार्य भी क्या...?....विकृति प्रकृति को मूल प्रकृति मे परिवर्तन का कार्य.यह धरती की रक्षा के लिए जरूरी भी तो है.नही तो आधुनिक बिज्ञान के नाम पर जिस तरह से प्रकृति से छेड़ छाड़ हुआ है उससे तो सारी धरती ही विनास के कगार पर बढ़ती ही चली जा रही है.....
अध्यात्म और धर्म के प्रसिद्द लोग अपने सभी कर्मो से ,अपने आश्रमों से,अपने उपदेशो से सारे जगत को सतयुग में प्रवेश कराने के लिए अपना सारा जोर लगा रहे हैं. ...सभी लोग सतयुग में घुसने के लिए अपना सारा जोर इन सबके पीछे से अपने जिन्दगी का बहुत ही कस कर जोर लगा रहे हैं....
सतयुग में सभी लोगो को ले जाने का दावा करने वाले ये लोग अपने -अपने प्रयास में पूरी तरह लग गये हैं॥कारोबार और ब्यापार पूरी तरह चालू है। इस बेचारे कलयुग को ये लोग जबदस्ती ही सतयुग में धकेलते हुए ले जाने का अपना-अपना दावा ठोकने वाले लोग शायद यह सोचना तक भूल गये हैं की जबतक कलयुग है तब तक इतने भारी भरकम युग को कैसे और कहा ले जाकर सतयुग में रखेंगे...?..
ये ज्ञानी लोग हैं और इनके पास भारी भरकम शब्दों की भीड़ है जिसमे भोले भाले लोगो को बहला और बहका कर अपना धंधा बखूबी चल रहे हैं.
दया आती है इन ज्ञानियों और पहुचे हुए लोगो की भीड़ को देख कर.....
ये सत्य है की ये सारे अपना पूरा जोर लगा कर कलयुग को सतयुग में लेकर चले ही जायेंगे..???...
लेकिन किसी ने भी कलयुग से ये नही पूछा की वो सतयुग में जायेगा भी की नही.कलयुग सतयुग में परिवर्तित होगा भी की नही...इसकी जरूरत किसी ने भी नही समझी और न ही इसके बारे में कुछ भी सोचने तक का सामर्थ अपने अन्दर उत्पन्न किया.....?.
जब तक कलयुग रहेगा ,तब तक सतयुग कैसे आएगा.?..धकेलने का प्रयास सभी कर रहे हैं...!
जब कलयुग का अंत होगा तभी तो यह युग सतयुग में परिवर्तित होगा.कलयुग के अंत होने पर ही सतयुग आने की संभावना बनती है.
इसीलिए ''बिधाता'' ने सबके ,सारे संसार में बढ़ती हुयी इस मांग को देखते हुए की ''कलयुग का सतयुग में परिवर्तन और प्रवेश होना चाहिए''.
की पूर्ति के लिए कलयुग का अंत करने का निश्चय कर लिए और धीरे-धीरे करके कलयुग का अंत करने लगे....
कलयुग के अंत होने की इसी प्रक्रिया का एक भाग न्यूजीलैंड में भूकम्प का आना,जापान में भूकम्प का आना और सुनामी का आना ,ज्वालामुखियो का अपना मुख खोलना इत्यादि तथा ऐसे ही प्राकृतिक तत्वों के आपसी टकराहट और बिघटन के परिणाम से उत्पन्न घटनाये हैं.पिछले तिन से चार वर्सो से आप अपने चारो तरफ की धरती पर प्राकृतिक हलचल और तीव्र होती जा रही बिध्वन्सक घटनाओ को देख कर मेरी बातो को समझ सकते है.ये सीधा ईशारा करते हैं , कलयुग का अंत प्रारम्भ किया जा चूका है. ताकि सभ्यता के ठेकेदार लोग जो बच जाये उसे लेकर सतयुग में जा सके.....
कार्य क्रम अभी जारी रहेगा. बिध्वंस की घटनाये पिछले की अपेक्षा तीव्र गति से बढ़ती ही जाएगी....
यह तो माँ की पगध्वनि से उठा हुआ मधुर संगीत है....जिसे सुनने के लिए सारे जगत अपने-अपने कर्मो से खुद ही वीवस है.क्योकि कर्म ऐसा ही तो उसने ही किया है..........
मैंने पिछले ब्लॉग में लिखा है ना की,''प्रथम मानव शरीर धारी ''अघोर'' शिवपुत्र ''' ने कलयुग में अपने माँ की मूल महाशक्तियो को प्रदर्शित करने का काम चालू कर दिया है और समय की गति,काल की गति बढ़ा दी गयी है.....प्राकृतिक तत्वों का फिरसे एक बार पुन: समायोजन और संतुलन का कार्य प्रारम्भ है......
ऐसे महत्वपूर्ण कार्य को करने में लगे हुए ''अघोर'' से छेड़ छाड़ करना ठीक नही है .अन्यथा महाशक्तिया कुपित होकर महाप्रलय प्रारंभ कर देगी और मेरे पिता श्री के तांडव के बारे में सभी ने कुछ ना कुछ सुन ही रखा है......
धैर्य के साथ इंतजार कीजिये.आप सभी के सामने महाप्रकृति में सारे कार्य क्रम समय-समय पर यु ही परोस कर प्रस्तुत कर दिए जायेंगे....
धन्यवाद्....
विशेष---- कार्यक्रम चालू है,कार्य की गति बढ़ती ही जाएगी......किसी को भी निरास नही होने दिया
जायेगा.सभी अपने-अपने कर्म फल के पुरे . .
अधिकारी हैं...............प्रलय खंड में जब प्रवेश होता है,तो शुरुआत भी ऐसे ही प्राकृतिक बिध्वंस से ही होती है...


Saturday, February 5, 2011

''बिधाता ''बाबा'' ने बिधान में 'परिवर्तन' कर दिया है''


''मै'' प्रथम मानव शरीरधारी ''अघोर''बोल रहा हूँ.
मुझे प्रकृति में परिवर्तन करना ,नियंत्रण करना और सञ्चालन करना अच्छा लगता है...
प्रकृति की मूल शक्तियों को मुक्त करा कर उनका स्वतंत्र प्रदर्शन कराना अच्छा लगता है...

मै ''यथार्थ '' हूँ ..''सत्य'' या ''झूठ'' नही...यही मेरा ''स्वभाव'' है...
''मै'',''युगों'' और सभी ''धर्मो'' का गवाह हूँ...सब मेरे ही सामने घटित हुआ है,नस्ट हुआ है और फिर पुनर्निवित भी हुआ... अभी ''प्रकृति परिवर्तन'' का कार्य तेजी से किया जा रहा है.और ''काल'' की गति तीव्र कर दी गयी है.. ''बंधन में पड़ी हुयी मूल शक्तियों को स्वतंत्र करा कर उनकी शक्तियों का प्रदर्शन किया जा रहा है .ताकि विकृत हो चुकी प्रकृति अपने मूल स्वरुप में स्थापित हो सके...यह ''धरती की रक्षा'' के लिए अति अत्यावश्यक है..हमने आधुनिक बिज्ञान के वैज्ञानिको को अपने जगत अर्थात धरती की प्रकृति में विवस,बेबस ,पंगु और लाचार कर दिया है..अहंकार का समूल सर्वनाश कर देना मूल स्वभाव होने से, ब्यक्ति हो या देश उसके बिध्वंस की शुरुआत कर दी गयी है...जहाँ असुरो का साम्राज्य है.असुर स्वभाव से किया जाने वाला कृत्य है,असुर भाव है,उसका अंत कर देना बहुत ही जरूरी है.यह युग के अंत की शुरुआत है.सभी के लिए सावधानी जरूरी है.. यह आध्यात्म और शब्दों का मात्र बकवास और विलास नही है..किसी के मानने या न मानने का कोई ईन्तजार और गरज नही है. ''यह तो मेरे पिता श्री बिधाता परमात्मा शिव ''बाबा'' केदारनाथ जी का हिमालय से ब्रह्माण्डीय आदेश और इक्षा है ,आदेश है...'' ''हमने धरती के मूल ट्राइंगल को जाग्रत कर उसमे,उसकी अवस्था में परिवर्तन कर दिया है..और वर्तमान में उस ट्राइंगल में लगातार हो रहे बिस्फोट का परिणाम है आज का प्राकृतिक अनिश्चितता और प्राकृतिक तत्वों में हो रहा बिध्वंस.''' विश्व युद्ध नही, बल्कि भ्रस्ट और असुर स्वभाव के देशो में सारी धरती पर गृह युद्ध होगा...सरकार ही नही ब्यवस्था में परिवर्तन किया जा रहा है सारी धरती पर...सब कुछ आप सभी के सामने ही घटित हो रहा है और इन घटनाओं में तीव्रता बढती ही जाएगी.किसी के रोके किसी भी कीमत और उपाय पर रुकेगी नही... युग परिवर्तन और सामूहिक जगत में हो रहा प्राकृतिक बिध्वंस आज के आधुनिक वर्तमान और सभ्य जगत तथा समाज की मूल मांग है...इसकी पूर्ति परमात्मा ने करना प्रारंभ कर दिया है.इससे मानवों में दूषित सोच परमात्मा के प्रति शुद्ध होगा .क्योकि उसके सामने परिणाम जो होगा...यही पुरुस्कार का वक्त है अपने -अपने कर्मो का...सभी को उसके किये गये कर्मो के हिसाब से उसका हक सुनिश्चित रूप से वितरित किया जायेगा.... ''बाबा श्री बिधाता'' ने ''अपने जगत के बिधान में परिवर्तन कर दिया है''
अब संसार बिधाता के नये संशोधित बिधान के अनुसार चलने के लिए बाध्य है ।परिणाम भी आना प्रारंभ हो गया है.सभी अपने जीवन तथा सारे संसार जगत में घटित हो रही घटनाओ को देख कर समझ ले.
''बिधाता के परिवर्तित बिधान के अनुसार जगत में परिवर्तन का परिणाम दिखलाई पड़ने लगा है.''

Saturday, December 25, 2010

''GLOBAL WARMING''के मुह पर''बर्फ''/''ठण्ड''का जोरदार ''थप्पड़'' कैसा लगा.?.

तारीख...22..dec.2010..

'''हिमालय की गुफा से ''बाबा'' के आदेशानुसार निकल कर जब नीचे के मानवों के सभ्य समाज में आया ,तो,मुझे दो-तीन बाते एकदम नई और शक्तिशाली रूप से दिखलाई दी...
..मानव सभ्यता के सभ्य बुद्धिजीवी और वैज्ञानिकों द्वारा आम आदमी को दिया गया एक अति भयानक शब्द..''ग्लोबल वार्मिंग''
'''''GLOBAL WARMING'''''
..पिछले जन्मो के महान असुरो द्वारा मानव शरीर में छुप कर अपनी वासनाओं और साजिशों द्वारा सारे धरती पर ''धर्म'' और ''विकास''तथा 'मानवाधिकार' तथा सभ्यता के नाम पर अपनी ब्यभिचारी आविष्कारों द्वारा नरक की साक्षात् रचना कर दी गयी.अहंकार इतना,कि ,आम आदमी ''बेचारा ''बन कर जीने के लिए मजबूर..
सामान्य मनुष्यों को सामान के नाम पर ,''सामान '' जैसा समझ कर किया जा रहा ब्यवहार तथा बर्ताब.आधुनिकता के नाम पर विश्व स्तर पर फैलाया हुआ सुनियोजित आतंक जो सभ्य देश तथा अत्याधुनिक समाज द्वारा इस जगत पर परोस दिया गया..
...मेरी जन्मदायिनी माँ ''अम्मा'' की मृत्यु के पश्चात ''मै''...''अपने पिता ''बाबा'' श्री केदारनाथ जी ,देवाधिदेव भगवान शिव जी'' के पास ''हिमालय '' में वापस चला गया था.अपना स्थूल शरीर का भी त्याग करने के लिए.क्युकी सारी इक्षाओं और वादों का अंत अपने ''मै '' कर चूका था...अपनी समस्त जागतिक शारीरिक ,मानसिक और अध्यात्मिक और साधनात्मक वासनाओ तथा इक्षाओं से बहुत पहले ही ''मै'' बाहर निकल कर इनसे मुक्त हो चूका था.अब इस शरीर से कोई भी ''काम'' मेरी नजरो में शेष ना रह गया था..
घटनाक्रमानुसार ''बाबा '' ने शरीर बिखंडन की प्रक्रिया के दरम्यान ही ''मुझे '' ''मेरे जन्म का मूल मकसद बताया''..और वापस मुझे धरती पर निचे की दुनिया में भेजा....
''सर्व प्रथम...मुझे अपनी ''मूल माँ''....''शक्ति'' को ,आसाम कामरूप से माँ कामख्या नाम से जगत बिख्यात ''सती'' को ,''सतयुग'' से तब तक बंधन में पड़े उनके ''सेकण्ड बॉडी'' को ''सेकण्ड खंड'' से मुक्त करा कर सदा के लिए वापस ले आना था...और माँ की मुक्ति का प्रमाण जगत के लोगो तक साबित हो,उसके लिए,माँ की शक्तियों का प्रदर्शन करते हुए आगे बढ़ना था...''
''जगत और संसार ..!..जो सदा से ही अपने को सभ्य और आधुनिक मानता है.उसे हर बात के प्रमाण की जरूरत सदा से ही रहा करती है..
'''परमात्मा और दैवीय सत्ता'' का प्रमाण बार_बार प्रमाणित करने के बावजूद भी ये अहंकारी मानव शरीरधारी असुरो ने सदा से ही माँगा है और जगत पर अत्याचार किया है...
...अपनी इस यात्रा में मुझे शक्तियों का प्रदर्शन करते हुए ''माँ''की शक्तियों, (मूल प्राकृतिक शक्तियों) का प्रदर्शन करते हुए प्रमाण साबित करना था....
माँ ( शक्ति _ सती ) और मेरी ( गर्भस्थ शिशु )की मृत्यु के पश्चात से ही निरंतर विकृत हो रही प्रकृति को सम्हालते हुए,मुझे विकृति हो चुकी प्रकृति,विनास के कगार पर पहुंचाई जा चुकी प्रकृति को ,उसके '''मूल स्वरुप'',''मूल प्रकृति''में स्थापित करना था...
'''मै'',ने आधुनिक बिज्ञान और बैज्ञानिको के मुह से संचार माध्यम के द्वारा एक अति भयावह ''शब्द''सुना....
वो शब्द है.......''''ग्लोबल वार्मिंग '''( ''''GLOBAL WARMING'''') ....
''मै'' आधुनिक भाषा और शब्द नही जानता.इसलिए लोगो ने बतलाया की ''धरती गर्म '' हो रही है और वातावरण गर्म हो रहा है...जल की कमी हो रही है.बर्फ के ग्लेशियर ख़त्म होते जा रहे हैं..'''
सन 2005/6 के आसाम प्रवास के दौरान मै,ने ''माँ'' को उनके सभी दसो रूपों के सहित सदा के लिए चार युगों से बंधन में पड़ी ''अपनी माँ कामख्या को स्वतंत्र करा लिया...युगों से बंधन में रहने से,मुक्ति के बाद ,महीनो तक ''माँ'' एक नन्ही बच्ची के रूप में ''बाबा श्री'' के गोद में सो कर आराम करती रही..
इधर स्थूल जगत में मानव शरीर धारी असुर लोग हमारे रास्ते में तरह-तरह से बाधाएँ पैदा करते रहे....
मेरे हिमालय से निकलने के पश्चात की दुनिया में मानव शरीरधारी असुरो ने अपने स्वभाव और कर्म के अनुसार फिर इस बार मुझे यातनाएं तथा वेदनाएं दी तथा मेरी हत्या तक की...
...दिल्ली आने पर यहाँ की धरती ने अपनी सुरक्षा की गुहार मेरा पैर छूकर लगायी.और मुझे अपने पिता रूप में संबोधित किया..
...लोग कहते रहते हैं की धरती गर्म हो रही है..
'''GLOBAL WARMING '' हो रहा है.बैज्ञानिक और बिज्ञान तरह-तरह से उपाय कर रहे हैं तथा धन कमा रहे हैं.गरीब लोगो का जीवन निचोड़ कर तरह-तरह की योजनायें बनाना तथा मीटिंग करना इनका स्वभाव तथा फैशन और शौक बनते हुए सारा संसार और जगत के लोग देख रहे हैं.इनके पास धन है,इनके पास यंत्रो,मशीनों की शक्ति है,इनका स्वार्थ किसी भी तरह पूरा करने के लिए इनके पास विभिन्न तरह के हथियार और कानून हैं.ये जो चाहे कर सकते हैं.ये अत्याधुनिक हैं.इनके पास साइंस है...यह सब कुछ देखना संसार के अधिकांश बेकसूर लोगो की विवशता है.आज जगत के लोग इनसे लाचार हो चुके हैं..
''धरती ''..गर्म हो रहा है.GLOBAL WARMING चल रहा है.सभी का कारण ..!..साइंस यही तो कहता है ना..!....
...''मै'',ने 2009 के दिसंबर और जनवरी 2010 में ''अपनी ''माँ कामख्या''के तीन मूल शक्तियों ''को भी बंगाल क्षेत्र से मुक्त कराया.क्योकि धरती की गर्मी को ठंडा करना था.इसलिए आप देखेंगे की पिछले डेढ़ - दो वर्ष से मै सारी धरती पर जल और बर्फ की चादर बिछा कर इनके ग्लोबल वार्मिंग के गर्मी को ठंडा कर रहा हूँ..ताकि धरती की गर्मी कुछ कम हो सके...
''आप लोगो को ''प्रथम मानव शरीरधारी ''अघोर शिवपुत्र''' का काम कैसा लग रहा है..???''
हमारा स्वभाव है...''अहंकार और घमंड का बिध्वंस कर देना'''....
तीन- चार साल से किये जा रहे शासक ,देश,संस्थान तथा ब्यक्ति और धर्म आदि के दूषित तथा पाखंडी अहंकार तथा घमंड का दमन कर यह साबित कर दिया जा रहा है,कि ''शक्तियां स्वतंत्र हैं''...और मुक्त चहल कदमी कर रही हैं इस धरती पर चारो तरफ..
''मै''ने धरती की प्रकृति पर पूरी तरह अधिकार कर लिया है....
सावधानी से चलो प्रकृति को मै तीव्रता से परिवर्तित कर रहा हूँ.प्रकृति अब मेरी इक्षा अनुसार चलने लगी है.
''यह महान देश ''भारत वर्ष '' में ''मै'' स्थित हूँ और इसकी रक्षा कर रहा .विश्व स्तर पर परिवर्तन कर ''मै'' ने साबित कर प्रमाण देना प्रारंभ कर दिया है....मित्रता का पाखंड मै जानता हूँ...इसीलिए धरती के निचे एक अधोमुखी त्रिकोण निर्मित कर ''मै'' ने शत्रु देशो को घेर कर अपने आगोस में लेना शुरू कर दिया है..''
जो ''असुर ''जिस शक्ति और साधन तथा छल और चाल पर अहंकार करेगा.उसे प्राकृतिक रूप से समूल दमित कर नस्ट कर दिया जायेगा.आप सभी देख ही रहे है.आप सभी अपने -अपने जीवन में इसी धरती पर देखते चलने के लिए प्राकृतिक रूप से बाध्य हैं...
हम प्रकृति में उत्पन्न हो गयी विकृति की सफाई कर रहे हैं तथा सजा रहे हैं.
...अभी थोडा GLOBAL WARMING को ठंडा कर रहा हूँ...
अत्याधुनिक बैज्ञानिक और बिज्ञान रोक सके तो रोक कर दिखलाये...
..प्रकृति में परिवर्तन और मूल प्राकृतिक शक्तियों का प्रदर्शन तथा कार्यक्रम चालू है.आप सभी भी आमंत्रित हैं.इस खेल का ,इस अघोर कृत्य,इस अघोर लीला में आप सभी सहभागी तथा सहयोगी हैं..आनंद लीजिये और अपना-अपना जीवन ब्यतीत कीजिये...
''धर्म और अध्यात्म तथा बिज्ञान क्या है.....?????'''
सिर्फ ''शब्द'' ही तो......!...
और मै इन शब्दों में बिस्फोट करना जानता हूँ.कार्यक्रम आपके सामने प्रस्तुत है.कैसा लगा ...?..कैसा लग रहा है.?..जरुर लिखे...?..और अपना जीवन जीते रहें..चलिए चलते हैं.अभी..!...ग्लोबल वार्मिंग की अभी थोडा ठंडा कर लेने दीजिये...
'''GLOBAL WARMING'' के मुह पर अभी ''मै'',ने ठण्ड ( जल /बर्फ )का एक कस कर ''थप्पड़'' भर मारा है''''
सबकी गर्मी को ठंडा करने का एक मात्र उपाय..?....
''अघोर शिवपुत्र '' तथा ''शिवपुत्र एक मिशन''....
यही तो मिशन है अपने आप में,शिवपुत्र का...
.अपने अघोर अवस्था का अघोर प्रदर्शन करना हमारा जन्म -जन्मान्तर का स्वभाव तथा अधिकार है...
''अघोर शिवपुत्र द्वारा पहले ही इस ब्लॉग में दो मैप ,नक्शे जिसमे त्रिकोण बना कर ब्याख्या और उससे प्रभाव का सूक्ष्म संकेत खुलेआम दिया गया है..'''
हमारे द्वारा आज कही जा रही बातों को ठीक से समझने के लिए आप पिछले ब्लॉग पोस्ट को भी पढ़ते तथा समझते रहे.आज घटित हो रही घटनाओ की सुचना पूर्व में ही दे दिया गया है ,अनेक जगहों पर.जैसे -जैसे मौसम में तत्वों की अधिकता से वातावरण प्रभावित होगा.उस समय बैज्ञानिक भविष्यवाणियो को पूरी तरह दमित करके उन -उन तत्वों का बिस्फोट कर उनका बिध्वंसक रूप प्रस्तुत कर दिया जायेगा....
हमारे जाग्रत उर्ध्व त्रिकोण में प्रारम्भ किया गया बिस्फोट रोका नही गया है.बंद नही किया गया है.बस थोडा धीमा कर दिया गया था.क्योकि मेरा स्थूल शरीर जहर के प्रभाव से काफी कमजोर हो गया है,पहले से.परन्तु इसका मतलब यह कत्तई ना निकला जाये कि कार्य रुक जायेगा.जब ''मै'' आराम करता हूँ ,तो,यह आराम भी एक तैयारी होती है.आगे के किसी विराट प्राकृतिक कार्य के निमित्त..
हमे मालूम है की ''अघोर शिवपुत्र'' के बातो को लोग मजाक उड़ाते हैं.और लोगो को इतना भी अँधा नही होना चाहिए की उनके ही जगत में घटित हो रही घटनाओ को भी ना देख सके.वैसे तो सभी का अपना-अपना जीवन है.और अपने -अपने ब्यक्तिगत जीवन में हर ब्यक्ति आत्महत्या करने के लिए स्वतंत्र है.और जैसे आज मेरी माताएं स्वतंत्र है,वैसे ही ब्यक्ति भी स्वतंत्र है.कुछ भी करने के लिए अपने जीवन के साथ......!....
लोग नही मानेंगे तो क्या प्रकृति में परिवर्तन का कार्य रुक जायेगा...?...ये सिर्फ एक शरीरधारी जीव हैं.मानव हैं भी की नही..!..पहले यह सुनिश्चित कर लिया जाये.यह अपने मानव होने का प्रमाण सुनिश्चित करवाने के लिए अत्याधुनिक बिज्ञान के माध्यम से अपना D.N.A.Test करवा कर देख ले.!..
''आधुनिक बिज्ञान !..तो,प्रमाणों तथा तथ्यों पर आधारित ज्ञान है ना...?..तो,पहले मनुष्य जो अपने आपको बुद्धिजीवी प्राणी और आधुनिक समझ रहा है.वो उपलब्ध बिज्ञान द्वारा अपना D.N.A. परीक्षण करवा कर देख ले,की ,वो मनुष्य कितना प्रतिशत है...???
अगर अभी तक अपना टेस्ट नही करवाया तो फिर वो प्रथम मानव शरीरधारी ''अघोर''की बातो और किये जा रहे कार्यो तथा कृत्यों को कैसे समझ सकेगा..?...देखो...???....बेटा ....सब सामर्थ्य की बात है...!...है ना...!...
,,जितना और जैसा सामर्थ्य होगा,वैसा ही तो काम करेगा...आज की सभ्यता के पास भविष्यवाणियाँ हैं,अटकले हैं,अनुमान है,शब्दों का नाटक है,अत्याधुनिक बिज्ञान है,शास्त्र है,धर्म और अध्यात्म है.समृद्धि और सुबिधाओं के साथ साधन भी है.फिर भी वो ''GLOBAL WARMING ''का ठंडा होना नही समझ पा रहा है.???...तो,इसमे इनकी यही ''अयोग्यता'' है ,यही इनका सामर्थ्य है...???.....फिर .....
मै,ने पहले ही कहा है,की यह धरती और यहाँ का प्राकृतिक जगत का ''मै'' राजकुमार'' हूँ.मै उत्तराधिकारी हूँ,''बाबा '' का....सम्राट और बिधाता ,परमात्मा तो ''बाबा'' हैं....मेरे पिता श्री.और माँ के साथ हम सभी स्वतंत्र रूप से क्रियाशील हैं.इस धरती पर हम अपने शरीरो के साथ उपस्थित और क्रियाशील होकर जगत और प्रकृति का सञ्चालन कर रहे हैं.
यह मेरे सभी शिष्य जो आज भी इमानदार हैं या मानव शरीर धारी ''असुर'' हैं,स्वीकार करते हैं....
यही तो है ''स्वीकार योग की शक्ति और सामर्थ्य'''...''सामर्थ'' सिर्फ पुरुष का ही होता है.औरत और मर्द का नही ....और 'शक्ति' सिर्फ 'पुरुष' के पास ही रहती है.औरत और मर्द के पास नही......
और ''मै'' तो मात्र हूँ......एक ''पुत्र''....
'''शिवपुत्र''''''..........''''अघोर शिवपुत्र''......
''''सभी अपनी -अपनी दुनिया में जी रहे हैं.तुम्हारी दुनिया में कोई नही जियेगा बेटा..!..यह जो मै कह रहा हूँ.यह मेरी अपनी दुनिया की घटनाएँ तथा सूचनाएं हैं...''''
देखते रहो....
''GLOBAL WARMING '' के मुह पर ठण्ड का जोरदार थप्पड़ ....!....
कैसा लगा .......???
जरुर लिखना ..आगे --आगे भी भी देखते रहो .सब परोस दिया जायेगा,तुम्हारे अपने ही सामने,इसी जीवन में ही..

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